
जर र्गौर से र्वढयेर्ग आज हम री अर्नी कुछ ख़ स ब त ां क मेरे
य र ां
मैं और क् क् करन च हत हूँ अर्ने इस ब की जीिन में मेरे य र ां
दयसर ां की ख वमय ां क वनक िने से मैं अर्न िक़्त बब पद नहीां करत
हूँ
अर्ने खुद क विश्लेर्षण करके तभी ही मैं दयसर ां की क ई ब तें करत
हूँ
अर्ने क ई ख़ स सिर य मांवज़ि क एक सिि र ही ह न च हत
हूँ
विर अांत में वकसी घने जांर्गि के बहते दररय क बह ि ह न च हत
हूँ
िहीूँ र्र दयर आसम न से वर्गरते हुए झरने में कहीां खुद ख ज न
च हत हूँ
इस तरह की जीिन से अर्ने आर् क सज धज कर रखन च हत
हूँ
वबन वकसी ररि ज ां और ररश् ां की अर्नी मधुर वजांदर्गी बन न
च हत हूँ
बहुत सुख से वजय हूँ सम ज की सेि कर के मैं अब मैं ह न च हत
हूँ
खुद क इतन भी न बच कर जीिन के सब ब ररश ां में भीर्गन
च हत हूँ
ज नत हूँ मुझे क ई च ूँद नहीां देर्ग र्र अर्ने चहरे क चमकन
च हत हूँ
म नत हूँ की ददप हीर और म ती से हैं उनक आूँख ां से न बह न
च हत हूँ
46
हम री हसीां ह ांठ ब नी है क म ि ने की उन्ें सद मुिुर ने देन
च हत हूँ
ब ररश और धुर् में ब हर अर्ने आूँर्गन में ज कर खेिन कयदन
च हत हूँ
कौन कहत है वदि वमि ने क बस अर्ने द स्त ां से ह ूँथ वमि न
च हत हूँ
कुछ भी मेरे सर्न से बड़ नहीां ह त र्र र्ररश वनय ां में सुन्दर सुन्दर
सर्ने देखन च हत हूँ
क ई दुुः ख भी मेरे सर्न से बड़ नहीां है र्र रुकत झुकत वर्गरत
सांभ ित चिन च हत हूँ
जब भी कभी शवदपय ां के मौसम आएां त मैं वदन के ओस ां की र्गरम
बयूँदें बन ज न च हत हूँ
िेवकन सभी र्गमी के मौसम ां में सुबह की उन धुांध के वकरण ां में मैं
कही ां छुर् ज न च हत हूँ
जब ि िम्बी र तें नहीां कटती त मैं र्गुम चुर् ह कर आर म की नीांद
में स ज न च हत हूँ
इस छ टी सी वजांदर्गी के खयबसयरत र ह ां में अर्ने सभी नेक वनश न ां
क छ ड़ ज न च हत हूँ
इस मनम हक दुवनय ां के खुिे नीिे आसम न क देख र्रख कर िह ां
उड़ ज न च हत हूँ
कुछ इस तरह मैं आर म से चित रह जीिन में बहुत थक र्गय अब
वबखरन च हत हूँ
अर्ने वदि और वदम र्ग क कभी सख्त नहीां वकय अब टयटन नहीां
र्र वर्घिन च हत हूँ
जब से ह स सांभ ि तबसे वजांदर्गी क वहस ब िेत रह र्र अब मैं भी
बहकन च हत हूँ
भिे द ही र्ि की यह वजांदर्गी है र्र जबतक जीऊांर्ग मैं सद ियि ां के
तरह महकन च हत हूँ
सीधे स धे रहें हैं कुछ र्ेंच और कुच ि नहीां थे अब जीभर आत है त
थ ड़ र िेन भी च हत हूँ
47
48
इस जीिमां में एक खुिी वकत ब थे हम अब क ई र्द पद री नहीां ज
कहन है अब कह देन च हत हूँ
ददप वजसक भी ह त थ छिकती थी आूँखें मेरी उस दय दृवष्ट् क
कभी कम नहीां करन च हत हूँ
क ई दुश्मनी निरत वर्गि य वशक यत न रखन वकसी से बस अब
सभी से म फ़ी म ूँर्गन च हत हूँ
ख़ुशी त ह ती रही है य द कर के सभी उन मौसरे य र ां की अब क ई
बेवदिी नहीां करन च हत हूँ
र्गुजर चेकें है चौर सी िर्षों के सभी शुभ वदन र तें महीने स ि उनक
अब द हर न नहीां च हत हूँ
न ज ने वकतने अच्छे अच्छे र्गुफ्तर्गय हमने वकये अर्ने वजर्गरी द स्त ां से
उनक य द रखन च हत हूँ
जब भी कभी भीड़ में अर्ने आर् क तनह र् त हूँ त अर्नेर्न क
सही एहस स भी कर िेत हूँ
अर्ने वजर्गरी ि र्ग ां के स थ वबत ई थी ज हसीन र्ि ां क उनक अब
अर्ने वदि से य द कर िेत हूँ
मैं ऐस नहीां रह की अर्ने र्रेश वनय ां से िड़ न सक र्र अब वबन
र्रेश वनय ां के रहन च हत हूँ
वबन दुुः ख के सुख क सही एहस स वकसीक नहीां ह त मांवजि तक
जरर र्हुूँच न च हत हूँ
म नत हूँ की यह दुवनय ां वकसीक अर्न नहीां अर्न ती र्र मैं सद
सच्चे प्य र क म नत ज नत हूँ
वजतन भी कुछ म विक ने हमक वदय है ि जीने के विए क िी है
सबक धन्यब द देन च हत हूँ
अर्गर कभी हम र आांसय बहे तब यह महसयस ह त है की हम र
जीिन द स्ती के वबन वकतन सयन ह त है
हम रे सभी द स्त ां की जीिन स र्गर जैस र्गहर ह त है
हम रे द स्त ां के जैस द स्त कह ूँ वकसी के र् स ह त है
48
इस वजांदर्गी क एक झिक
जब हमनेअर्ने इस वजांदर्गी क एक झिक देख त ि मेरे र ह ां में
र्गुनर्गुन रही थी
जब ढयूँढ मैने उसक इधर उधर त िह मुझ से आूँख वमचौनी खेिती
नजरआती थी
इस बुढ़ र्े में आर्गय मुझे भी कर र की ि खयब सहि सहि कर
मुझे सुि रही थी
तब हम द न ां स थी क् ां न र ज ह ां एक दयजे से मैं उसे और ि मुझक
समझ रही थी
अांत में मैंने उससे र्यछ ही विय की ि क् ां कभी कभी मुझे दुुः ख ददप
वदय करती थी
तब ि थ ड़ हांसी और ब िी की मैं तेरी वजांदर्गी हूँ र्र्गिे तुम क जीन
सीख रही थी
इस वजांदर्गी में उांच ि चढ़ ओ त िर्ग ही रहत है इसी क हम सही
वजांदर्गी कहतें हैं
दुुः ख ददप के ब द सुख सांत र् वमित है इसी तरह अर्ने वजांदर्गी क
र्हच न िेते हैं
अक्सर ि र्ग जि ज तें हैं हम री मुस्क न से क्यांवक मैं ददप क नुम इश
नही ां वकय है
इस वजांदर्गी से ज कुछ वमि क़ुबयि थ वकसी और िस्तु क
िरम इश नहीां वकय है
इस वजांदर्गी क र्ुरे तरह समझन मुक्तिि थ क्यांवक मेरे जीन क
अांद ज अिर्ग थ
जबभी जह ूँ ज कुछ वमि उसक अर्न विय र्र ज न वमि
उसक ि िच नहीां थ
यह मैं म नत हूँ की र्गैर ां के मुक बिे में वकसी से ज्य द कभी हमने
र् य ही नहीां थ
हमक इतन िक्र है की मैं 'सांत र्षम र्रम सुखम' क न र सद ही
िर्ग य करत थ
49
बस हम री यह वजांदर्गी ययूँही सुच रु रर् से चिती रही और मेरी यह
सिर ज री रह
कुछ ि र्ग हम रे वदि के करीब ह विए र्र कई ि र्ग भयि र्गए थे की
Describe what you're looking for in as much detail as you'd like.
Our AI reads your request and finds the best matching books for you.
Popular searches:
Join 2 million readers and get unlimited free ebooks