Kavitanjali by Dr Ram Lakhan Prasad - HTML preview

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2024

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समर्पण

हमने अर्ने सभी िेख ां के विए अर्ने बुजुर्गो क समरण वकय है

और आज भी उन्ी ां क इस प्रक शन क समवर्पत करत हूँ क्यांवक

उन्ी ां की सौजन्य से हमने अर्ने सभी र्गुण ां क ह वसि वकय है।

हमक जब भी थ ड़ी सी कुछ सहवियत वमिती है त मैं अर्ने

बुजुर्गों क आदर सत्क र करत रहत हूँ। यह सब ज्ञ न, श न

और मय पद उन्ी ां के द्व र हम क प्र प्त हुि है। मैं उन सब क

अर्न ह वदपक धन्यब द देत हूँ।

प्र थपन

अब सौांर् वदय इस जीिन क , सब भ र तुम्ह रे ह थ ां में।

है जीत तुम्ह रे ह थ ां में, और ह र तुम्ह रे ह थ ां में॥

मेर वनश्चय बस एक यही, एक ब र तुम्हे र् ज ऊां मैं।

अर्पण करदयूँ दुवनय भर क , सब प्य र तुम्ह रे ह थ ां में॥

यवद म नि क मुझे जनम वमिे, ति चरण ां क द स बनय।

इस र्यजक की एक एक रर्ग क , हर त र तुम्ह रे ह थ ां में॥

जब जब सांस र क कैदी बनय, वनष्क म भ ि से क म करूँ।

विर अांत समय में प्र ण तजयां, वनरांक र तुम्ह रे ह थ ां में॥

मुझ में तुझ में बस भेद यही, मैं नर हूँ तुम न र यण ह ।

मैं हूँ सांस र के ह थ ां में, सांस र तुम्ह रे ह थ ां में॥

अब सौांर् वदय इस जीिन क , सब भ र तुम्ह रे ह थ ां में।

है जीत तुम्ह रे ह थ ां में, और ह र तुम्ह रे ह थ ां में॥

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